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Saturday, 11 September 2021
हम कब शरीक होते हैं / अकबर इलाहाबादी
हम कब शरीक होते हैं दुनिया की ज़ंग में
वह अपने रंग में हैं, हम अपनी तरंग में
मफ़्तूह
[1]
हो के भूल गए शेख़ अपनी बहस
मन्तिक़
[2]
शहीद हो गई मैदाने ज़ंग में
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