📰 सच की दुनिया

कविता | लेख | खबर

Saturday, 11 September 2021

हाले दिल सुना नहीं सकता / अकबर इलाहाबादी

हाले दिल सुना नहीं सकता

लफ़्ज़ मानी को पा नहीं सकता

इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

होशे-आरिफ़ की है यही पहचान
कि ख़ुदी में समा नहीं सकता

पोंछ सकता है हमनशीं आँसू
दाग़े-दिल को मिटा नहीं सकता

मुझको हैरत है इस कदर उस पर
इल्म उसका घटा नहीं सकता

No comments:

Post a Comment

© सच की दुनिया