शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा / अकबर इलाहाबादी

शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा
दिल में घर करके मेरी जान ये परदा कैसा

आप मौजूद हैं हाज़िर है ये सामान-ए-निशात 
उज़्र सब तै हैं बस अब वादा-ए-फ़रदा कैसा 

तेरी आँखों की जो तारीफ़ सुनी है मुझसे 
घूरती है मुझे ये नर्गिस-ए-शेहला कैसा 

ऐ मसीहा यूँ ही करते हैं मरीज़ों का इलाज 
कुछ न पूछा कि है बीमार हमारा कैसा 

क्या कहा तुमने, कि हम जाते हैं, दिल अपना संभाल 
ये तड़प कर निकल आएगा संभलना कैसा